शुक्रवार, 6 मार्च 2009

महात्मा गाँधी की निजी वस्तुओँ का मोल देश के प्रमुख मदिरा व्यवसायी ने चुकाया

कितनी विडम्बना की बात है यह कि जिस व्यक्ति को देश व सम्पूर्ण विश्व सत्य, शांति और अहिंसा के पुजारी के रूप में जानता है, जिन्हें हम भारतवासी राष्ट्रपिता का सम्बोधन देते हैं, उन्हीँ की निजी वस्तुओं की सार्वजनिक नीलामी, विश्व के भौतिक रूप से सम्पन्न राष्ट्र सं. रा. अमेरिका के व्यवसायी द्वारा धन, व शायद लोकप्रियता प्राप्त करने के लोभ के वशीभूत हो कर दी गयी।

समाचार के अनुसार, न केवल यह बल्कि उसने तो इन वस्तुओं को भारत को वापस करने का प्रस्ताव स-शर्त रखा - यदि भारत अपनी रक्षा-नीतियों (रक्षा-खर्च) में कटौती करे (व उन्हें स्वास्थय सेवाओं में लगाये) परंतु यह भी शायद अभिनय ही था। वह भी रखा या नहीँ, यह तो आने वाले समाचारों से विस्तार से मालूम हो जायेगा।

शायद अधिकृत रूप से इसे रोकने में वह सरकार असमर्थ थी, अथवा नहीँ, यह तो कानून-विज्ञ जानें परंतु मेरी दृष्टि में यह घटना वहाँ के समाज / सरकार / व्यवसायिकता की निम्न स्तरीय मानसिकता को दर्शाती है। यही देश विश्व में लोकमत, न्याय व शांति प्रसार का ढिढोरा पीटता दिखायी देता है

क्या इसे वह सरकार अथवा व्यवसायी वास्तव में चाहते तो क्या उनके द्वारा इसे रोका जाना चाहिये था? क्या दूसरे राष्ट्र के व्यक्ति को ऐसे परिप्रेक्ष्य में भारत को अपनी नीति निर्धारण के निर्देश देने का प्रयास उचित है?

और यह भी विडम्बना ही है कि उसी राष्ट्रपिता, जिनके जन्म-दिन पर श्रद्धा के प्रतीकस्वरूप पूरे देश में मदिरा की सार्वजनिक बिक्री पर प्रतिबन्ध है, उनकी निजी वस्तुओं को सार्वजनिक नीलामी में उसी मदिरा के प्रमुख भारतीय व्यवसायी, विजय माल्या के प्रतिनिधि द्वारा इसका मोल चुका कर खरीदा गया।

कल्पना करता हूँ कि क्या भारत अथवा कोई भारतीय नीलामकर्ता ऐसा कर सकता था? ...

हे राम!

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विस्तृत समाचार:
http://www.newspostonline.com/world-news/vijay-mallya-buys-gandhi-memorabilia-for-18-mn-third-lead-2009030637471

http://timesofindia.indiatimes.com/India/Gandhis_items_sold_for_USD_18_million_/articleshow/4231248.cms

6 टिप्‍पणियां:

प्रेम सागर सिंह ने कहा…

सराहणीय लेख, मैं नियमित पाठक बन गया हूँ। आपके ब्लॉग को अपने ब्लॉग पर लिंक दे रहा हूँ। ब्लॉग पर कुछ टूल्स बढ़ा लें।

ज्ञानदत्त । GD Pandey ने कहा…

बापू अपने साथ मद्यनिषेध को स्वर्ग लेते गये - इसी के धन्यवाद स्वरूप यह मोल चुकाया है अल्कोहल बैरॉन्स ने! :)

Rajeev (राजीव) ने कहा…

प्रेम जी, हमारा ब्लॉग तो मरुस्थल सा है, पोस्टों की नियमितता और संख्या में। आपके वनों जैसी हरीतिमा कहाँ!

ज्ञान जी, आपने तो बहुत कुछ कह दिया, इस टिप्प्णी में। ठीक ही है, अब समझ में आया - देश भी कृतज्ञ, महात्मा भी।

डॉ .अनुराग ने कहा…

सच जानिए आज यही बात दोपहर में मै अपने दोस्त के साथ कर रहा था .उस पर तुर्रा ये की माल्या खुले आम कहते है की सरकार का कोई रोल नहीं है .

शैलेश भारतवासी ने कहा…

राजीव जी,

माफ कीजिएगा कि इस पोस्ट पर मैं कोई और बात परोस रहा हूँ। आज आप हमारे आवाज़ पृष्ठ पर आये थे। आपने भूपेन्द्र का जिक्र किया था। भूपेन्द्र का विविधभारती के साथ दिया गया पूरा इंटरव्यू ही हमारे पास है। गलती से हम फेहरिस्त नहीं डाल पाये थे। सुनिए।

आवाज़ पर कुछ भी सुनना हो, उसके लिए वहाँ की फेहरिस्त देखें या सर्च (खोज) के बक्से में रोमन या देवनागरी में अपनी रुचि का शब्द, आप निराश नहीं होगें। यह मेरा वादा है।

उन्मुक्त ने कहा…

चलिये लिखना तो शुरू हुआ।