सोमवार, 23 मार्च 2009

बाबा को लिखते देखा है,

आज बाबा नागार्जुन के संस्मरण से सम्बन्धित एक पोस्ट पढ़ी बाबा नागार्जुन को मैंने लिखते हुए भी देखा है, जिसमें कि शास्त्री जी ने बाबा नागार्जुन के सान्निध्य में बिताये कुछ दिनों का वर्णन किया है। शास्त्री जी ने बाबा नागार्जुन के बारे में अन्य सचित्र आलेख भी लिखे हैं। शास्त्री जी लिखते हैं

रात में जब मेरी आँख खुली तो मैंने सोचा कि एक बार बाबा को देख आऊँ। मैं जब उनको देखने गया तो बाबा ट्यूब लाइट जला कर एक हाथ में मैंग्नेफाइंग ग्लास ग्लास लिए हुए थे और कुछ लिख रहे थे। मैंने बाबा को डिस्टर्ब करना उचित नही समझा और उल्टे पाँव लौट आया।

रात में जब 1-2 बजे मेरी आँख खुलती थी तो बाबा के एक हाथ में मैग्नेफाइंग-ग्लास होता था और दूसरे हाथ में पेन।

मैंने बाबा को 76 साल की उम्र में भी रात में कुछ लिखते हुए ही पाया था।
बाबा नागार्जुन की एक कविता (कदाचित सर्वाधिक लोकप्रिय भी), "बादल को घिरते देखा है..." मेरी सर्वाधिक प्रिय कविताओं में सर्वोपरि है, इस का स्वीकरण मैंने अन्यत्र भी कर चुका हूँ, अंतर्जाल पर भी यह सुन्दर कविता उपलब्ध है ही। मैं उनकी कविता का साहित्यिक स्तर आँकने के योग्य तो नहीँ हूँ, पर इतना अवश्य है कि इस कविता की हर एक पंक्ति और हर एक शब्द विशेष रूप से चयनित है और सम्पूर्ण है।

यह एक विस्मयकारी संयोग था कि उनके संस्मरण पढ़कर और उस पर उनकी पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर मुझे उनकी कविता और पोस्ट के शीर्षक में कुछ ध्वन्यात्मक साम्य लगा और कुछ पंक्तियाँ सहज ही बन गयीँ, उन पंक्तियों को फिर संपादित कर यहाँ लिख दिया है ताकि कि ये विस्मृत न हो जायें। साथ ही उनकी कविताओं की कुछ कड़ियाँ भी सन्दर्भ के लिये। मैं किसी भी स्तर का कोई कवि या रचनाकार होने का भ्रम नहीँ पाल रहा हूँ, मात्र सहेजने के प्रयास से इन्हें यहाँ लिख दिया है। कदाचित कभी संशोधित भी कर दी जाय।

बादल को घिरते देखा है !
बाबा को लिखते देखा है...

जीवन पथ के उस पड़ाव पर,

दृष्टि क्षीण थी पर नहीँ पराजित।


निशाकाल के शांत प्रहर में,

नभ में था विस्तार तिमिर का
,
पर आलोकित कृत्रिम प्रकाश से

अंतर्कक्ष की मद्धिम ज्योति में

उस एकाकी कवि के द्वारा

साहित्य सृजन होते देखा है।

जब शयन रत थे प्राणिमात्र सब,
कवि मन को कैसा विश्राम? 
निस्तब्ध शांति के ऐसे क्षण में, 

वीणापाणि के वरद पुत्र को

मनोयोग से चिंतन करते,

लेखन - मनन करते देखा है।


बाबा को लिखते देखा है...


सन्दर्भ हेतु बाबा नागार्जुन की उपरिवर्णित कविता की कुछ कड़ियाँ

7 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

भाई राजीव जी!
बाबा नागार्जुन जी तो तो मेरे मन में आज भी रचे बसे हैं। किसी समाचार-पत्र या अन्तर्जाल पर बाबा के सन्दर्भ में कुठ भी छपा होता है तो बाबा की स्मृतियाँ ताजा हो जाती हैं। मैंने तो बाबा की इस कविता को उनके मुख से प्रत्यक्ष रूप से व्याख्या के साथ सुना है।
बादल को घिरते देखा है !
बाबा को लिखते देखा है...

जीवन पथ के उस पड़ाव पर,
दृष्टि क्षीण थी पर नहीँ पराजित।

निशाकाल के शांत प्रहर में,
नभ में था विस्तार तिमिर का,
पर आलोकित कृत्रिम प्रकाश से
अंतर्कक्ष की मद्धिम ज्योति में
उस एकाकी कवि के द्वारा
साहित्य सृजन होते देखा है।

जब शयन रत थे प्राणिमात्र सब,
निस्तब्ध शांति के उस क्षण में
वीणापाणि के वरद पुत्र को
मनोयोग से चिंतन करते,
लेखन - मनन करते देखा है।

मेरे मित्र वाचस्पति शर्मा तो कहते थे कि बाबा की इस कविता का अर्थ तो बड़े-बड़े पी.एचडी के स्कालर भी नही कर पाते हैं।
बाबा की कविता प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | G.D.Pandey ने कहा…

अद्भुत छिहत्तर साला व्यक्ति और लेखन साधना रत मैग्नीफाइंग ग्लास से!
मेरे बाबा भी छियासी साला थे और आंख के आगे पोली मुठ्ठी बांध कर छेद के फोकस से पढ़ रहे थे के.एम. मुंशी का भगवान परशुराम।
आपकी बाबा नागार्जुन की चर्चा से मुझे अपने बाबा महादेवप्रसाद याद आ गये!

Abhishek Mishra ने कहा…

जब शयन रत थे प्राणिमात्र सब,
निस्तब्ध शांति के उस क्षण में
वीणापाणि के वरद पुत्र को
मनोयोग से चिंतन करते,
लेखन - मनन करते देखा है।

बाबा को लिखते देखा है...

बहुत ही अपनेपन से लिखी होंगी ये पंक्तियाँ आपने.

Mired Mirage ने कहा…

आज आपको यहाँ बहुत समय के बाद देखा है। स्वागत ! कविता बहुत सुन्दर लगी।
घुघूती बासूती

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

उम्दा!

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अनूप शुक्ल ने कहा…

क्या बात है जी! आपके कवि रूप के भी दर्शन हो ही गये। शानदार!