गुरुवार, 8 मई, 2008

सामूहिक गरियाने की गणित, लाभ व उपयोग

हाल ही में एक बंधु ने हम पर मज़ाकिया आरोप लगाया कि हम अपने कुछ साथियों को गरियाये रहे। उस समूह के हम स्वयं भी जबरिया सदस्य हैं। सही बात तो यह है कि हमने वास्तव में गरियाया तो नहीँ ही था, पर जब इस पर कुछ ध्यान गया, विचार-मंथन किया तो कुछ विचार अमूल्य रत्न की भाँति मिले। कुछ-कुछ वैसे ही - जैसे कि दूघ के मंथन से मक्खन या जैसे देवासुर समुद्र मंथन होने पर, पहले हलाहल व उसके बाद अलभ्य रत्न मिले थे।

हलाहल तो हम पी(क) गये! विचार रत्नों को आपके साथ बाँटते हैं।

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गरियाने से नुकसान तो जो होता हो वह तो मालूम नहीँ, पर उससे कुछ तो फायदे होते हैं ही। गरियाने की परम्परा निश्चय ही उतनी ही प्राचीन होगी जितनी कि मानव-सभ्यता। शायद यह प्रकृति प्रदत्त वरदान हो, शायद मनोवैज्ञानिक भी मानते हों कि गरियाने से मन पर बोझ हट जाता हो! निर्बल का संबल है यह। यहाँ पर हम गरियाने के एक विशिष्ट स्वरूप की बात कर रहे हैं।

गरियाने से हमें कोई उज्र भी नहीँ। अपने आप पर भी! सामूहिक तौर पर गरियाने की बात कहें तब तो बेहिचक अनेक अवसरों पर गरिया चुके हैं, जब उस समूह में हम स्वयं भी हों।

अजी, बड़ा आनन्द आता है!

वह कैसे?

आप मात्र अपने आप को गरियाने की कीमत पर पूरे समूह को बुरा भला कहते हैं। सामान्यत: कोई आपको कुछ कहता भी नहीँ क्योंकि आप स्वयं उस समूह के सदस्य होते हैं। आप एक सदस्य के बराबर स्वयं को गरियाने के एवज में अनेक लोगों को गरियाने का आत्म-सुख प्राप्त करते हैं। नफे-नुकसान की दृष्टि से देखें तो भी यह मेरे विचार से नुकसान का सौदा नहीँ।

गणित
ऐकिक नियम के हिसाब से भी यदि उदाहरण देखें:
- आप यदि एक व्यक्ति को गरियाते है तो आप को (1अ) मात्रा में सुख मिलता है
- यदि आप 10 व्यक्तियों के समूह को, जिसके आप भी सदस्य हैं, गरियाते है तो

यदि 1 व्यक्ति को गरियाने का सुख = (1अ)
तब 10 व्यक्तियोँ को गरियाने का सुख = 10 x (1अ) = (10अ)
घटायें:
(स्वयं के ऊपर गरियाने से न मिलने वाला सुख) = - (1अ)
(अपने ऊपर गरियाने से मिलने वाले दुख: के लिये) = - (1अ)

शेष = (10अ) - (2अ) = (8अ)
वाह! कैसा लाभ है यह प्रभो!

कुछ उपयोग
1.) यदि आप के साथी कर्मचारियों / कार्य संस्थान का रवैया आपको खराब लगता है तो आप स्वयं उस संस्था/समूह/कम्पनी के सभी लोगों की कार्य-प्रणाली पर गरिया सकते हैं। आप की बात में कोई आत्मश्लाघा भी नहीं दिखेगी और आप को सामूहिक रूप से गरियाने का उपरिवर्णित नियम के अनुसार सुख भी मिलेगा

2.) यदि आपको अपने पड़ोसी, मुहल्ले वालों को किसी बात पर गरियाना है, तब भी चाहे दबी ज़ुबान में ही सही, सभी मुहल्ले वालों को, स्वयं को भी विशेष रूप से शामिल करते हुए गरियायें।

3.) प्रत्यक्ष उदाहरण देखें - जो हम सभी ने प्राय: अनुभव किया होगा। सभी देशवासियों पर, सामूहिक रूप से, उनकी किसी भी प्रवृत्ति पर गरियाने से जो करोड़ों गुना (क्षणिक ही सही) सुख और अपनी कर्तव्यपरायणता का संतोष मिलता है, उसका अनुभव हममें से बहुतों ने अनेकों बार किया होगा।

चुम्बकीय बिंदु
1.) चूँकि परोक्ष रूप से आप अपने को भी गरिया रहे होते हैं, इसलिये लोगों में आपकी सत्यवादिता और न्यायप्रियता की भी छवि बनेगी। आखिर आप कोई अपने स्वार्थे हित की बात करते तो नहीँ ही जान पड़ते, तो कोई अपनी भी बुराई क्योंकर करेगा? आखिर बात में कुछ दम तो होगी ही न?

2.) यदि इस प्रकार सामूहिक रूप से गरियाने की आदत बनाना है तो एक बात का और भी ध्यान रखना होगा। गरियाने के विपरीत कभी-कभी किसी की प्रशंसा भी कर दें, बहुत कम, बस यदा कदा ही, विशेषकर जब गरिया पाने का किंचित मात्र भी कारण / अवसर न हो। इससे होगा यह कि, आपके ऊपर सदा ही गरियाने वाला जैसी मुहर नहीँ लगेगी और लोगों में यह विश्वास बढ़ेगा कि आप उचित, व्यक्ति की, उचित कारणों से प्रशंसा भी करते हैं। हाँ इस मंत्र का प्रयोग वैसे ही मर्यादित (Limited) रूप से करें, जैसे कि दाल में नमक - या फिर यह कहें कि खाद्य पदार्थों में सुगन्धि का प्रयोग।

3.) जैसे, जैसे आपकी सत्यवादिता की छवि बढ़ेगी, आपके गरियाने को वरीयता / मान्यता प्राप्त होगी और शायद आपके प्रति व्यक्ति गरियाने से प्राप्त आत्म-सुख की दर में भी वृद्धि होगी

4.) अंत में एक आत्म संतुष्टि और अपने को बचाने का असरदार उपाय - पहले तो आप सभी के साथ स्वयं को गरिया लेते हैं, सुख लूट लेते हैं। फिर भी यदि आत्म-ग्लानि शेष हो तो अपने को व अन्य आत्मीय जनों को यह समझा सकते हैं कि आप स्वयं तो अपवाद हैं। अब नियम हैं तो अपवाद भी होंगे ही - आखिर लंका में सभी असुर थोड़े ही थे

शनिवार, 27 अक्‍तूबर, 2007

चारु चन्द्र की चंचल किरणें...

इस शरद पूर्णिमा पर हम भी अवसर को हाथ से जाने नहीँ देना चाहते थे*। सोचा कि मौका अच्छा है, चाँद की छवि को सहेज लिया जाय।

तो इस बार विचार आया कि चाँद के साथ शरद पूर्णिमा की चाँदनी के छायांकन का भी प्रयास किया जाय। रात्रि का समय और हम चले घर की छत पर। बिजली भी गुल। फ़कत माहताब की ही रोशनी हमारे मुहल्ले और शहर को आलोकित कर रही थी। फोटोग्राफी के लिये उपयुक्त अवसर! अलग अलग दिशाओं से दिखने वाली दृष्यावली को देखा तो कोई भी दृश्य ऐसा न दिखा कि जो विशेष रूप से आकर्षक हो और चाँद की दिशा में भी हो। खैर, हमें तो छायांकन करना ही था। कुछ देर उधेड़-बुन में चहल कदमी करते रहे। शरद पूर्णिमा पर चंद्र किरणॉं से होने वाली अमृत-वर्षा के बीच हमने कुछ समय फोटोग्राफी के प्रयोग किये और फिर कुछ संपादन। कुछ ऐसा दृश्य था इस चाँदनी रात में हमारे घर की छत से -


यह चित्र कुछ मायनों में पूर्णत: सत्य नहीँ है - मतलब यह नहीँ कि यह झूठा ही है। है तो यह सच्चा ही, पर कुछ तकनीकी जुगाड़ से। चाँद और दृष्यावली - इन दोनों में बहुत भिन्नताएं होती हैं। प्रकाश के स्तर में भी बहुत फर्क होता है, और लेंस को दिखायी देने वाले आकार में भी। इसलिये इस दोनों दृश्यों को अलग अलग छायांकित किया गया और फिर सम्पादन से इन्हें संयोजित किया गया। यह सही है कि दोनों चित्र लगभग समान परिस्थितियों में, अलग - अलग समय में, मिन्न सेटिंग्स पर लिये गये है। दोनों ही चित्र रात के हैं।

यह रहे इनके अलग अलग चित्र -
अ) छत से केवल चाँदनी के प्रकाश में खीँचा गया छाया चित्र
sharad-poornima-2007-roof-night-shot-01
ब) चन्द्रमा का छाया चित्र
sharad-poornima-2007-moon-01
सम्पादन में बहुत अधिक फेरबदल तो नहीँ, कुछ आकार व प्रकाश स्तर का संयोजन और कुछ नील वर्ण का प्रभाव - बस इतना ही किया गया है संयुक्त चित्र को बनाने में।

तकनीकी जानकारी
तकनीकी जानकारी भी लिख देना ठीक होगा, ताकि सन्दर्भे के लिये उपयुक्त रहे।
अ) दृष्यावली -
ISO = 100, F = 8.0, Exposure = 137 Seconds, Focal Length = 55mm
अधिक देर का एक्सपोज़र देना आवश्यक था, जिससे कि मात्र चाँदनी के प्रकाश से ही पर्याप्त रूप से दृश्यावली आलोकित हो जाय। और इसलिये त्रिपदी (tripod) का प्रयोग भी किया गया। दृष्य का विस्तार अधिक हो, इसलिये बहुत अधिक फोकल लेंग्थ का प्रयोग नहीँ किया जा सकता था।
ब) चन्द्रमा -
ISO = 100, F = 16.0, Exposure = 1/125 Seconds, Focal Length = 263 mm
अधिक कंट्रास्ट व स्पष्टता के लिये कम एपरचर का प्रयोग किया गया। चंद्रमा के सापेक्ष आकार को प्राथमिकता देने के लिये, अधिक फोकल लेंग्थ का प्रयोग किया गया और इसी कारण से इस चित्र में भी त्रिपदी अत्यावश्यक थी पर खराबी आ जाने से उसका प्रयोग नहीँ हो सका और यह चित्र बिना त्रिपदी के ही लिया गया।

* एक बार पहले भी हमने चन्द्र देव के छायांकन का प्रयास किया है, वह भी एक और विशेष अवसर पर - विगत मई 2007 में Blue Moon के अवसर पर। किसी एक ही माह में दो बार पूर्णिमा पड़ने पर उसे अंग्रेज़ी में ब्लू मून कहते हैं और ऐसे अवसर बिरले ही होते हैं जिसके कारण Once In a Blue Moon कहावत भी चल पड़ी।
Once in a Blue Moon, 31 May 2007 Kanpur, India DPP_0276

सोमवार, 17 सितंबर, 2007

जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला (उड़नतश्तरी व फुरसतिया को चुनौती)

बहुत दिनों से चिट्ठा और टिप्पणी पर पढ़ ही रहा था, यूँ कहें कि विगत दो अथवा अधिक वर्षों से इस विषय पर अलग अलग विद्वान चिट्ठाकारों ने अपनी राय दी और हम इन्हें पढ़ते रहे, चुपचाप इन विचारों को आत्मसात करते रहे।

एक बार पुन: शास्त्री जी के लेख और उन पर होने वाली टिप्पणियों और प्रति-लेख को पढ़ने पर कुछ-कछ ब्राउनियन-गति जैसा अनुभव हुआ (कणों की पारस्परिक गति, जिसमें वे एक दूसरे से टकराकर ऊर्जा, गति व दिशा में बदलाव करते हैं) कुछ टिप्पणी, कुछ चिट्ठे, कुछ उन पर भी टिप्पणी। सरसरी तौर पर पढने से तो जो ऊर्जा मिली उसको तो अवशोषित कर लिया और शांत बैठे रहे, पर पुन: पढ़ने पर लिखने भर की ऊर्जा मिल ही गयी।

संदर्भ के लिये हालिया चिट्ठों की कुछ सिलसिलेवार कड़ियाँ:

शताब्दियों पहले जेम्स वॉट ने कभी भाप की शक्ति को जाना, प्रयोग किया फिर कई और अन्वेषण हुए, बहुत शोध होते रहे, यांत्रिक अभियांत्रिकी का विकास हुआ और समाज के ज्ञान का स्तर बढ़ता रहा। प्रयोग और अनुसंधान जारी हैं और रहेंगे।

ठीक वैसे ही चिट्ठाकारी से संबंधित ट्प्पिणियों पर, टिप्पणियों की अपेक्षा पर, टिप्पणियों के महत्व पर, पारस्परिक टिप्पणियों के आदान प्रदान पर, टिप्पणियों के मापदण्ड पर, लोकप्रियता बढ़ाने पर, हिट काउंटर्स आदि विषयों पर धीरे धीरे चिट्ठाजगत में परिमार्जित / परिवर्धित विचार प्रस्तुत होते रहे। चिट्ठाजगत में भी टिप्पणियों पर शोध जारी है। नये शोध से नये सिद्धांत भी प्रतिपादित होते रहे हैं।

ख़ैर, हमारे पास तो कोई विश्लेषण नहीँ है, पर अपने विचार ही लिखता हूँ -

1 - चिट्ठा लिखने के उद्देश्य
भिन्न लेखकों के भिन्न उद्देश्य हो सकते हैं। अधिकतर चिट्ठाकार संभवत: स्वांत: सुखाय लिखते हों, कभी किसी ने कहा कि ऐसा नहीँ होता, यदि ऐसा ही हो तो वे डायरी लिखना पसंद करें। कुछ प्रतिक्रिया स्वरूप लिखते हैं। हम तो "ऐसे ही" लिखते हैं (अव्वल तो लिखते ही नहीँ) यदि लेखक मात्र इस उद्देश्य से लिखें कि चिट्ठा तो केवल उसका विचार/ लेख संकलन है तब न तो कोई अपेक्षा होगी न क्लांति। बस, हम चिट्ठे को अपनी डायरी ही मान लें, इस सुविधाके साथ कि उसके संपादन के लिये यह मात्र एक तंत्राश है, कोई कभी पढ़ भी ले तो कोई उज्र नहीँ।

सुनील दीपक जी के चिट्ठे पर अधिकांशत: सहजता और सरलता की छाप दिखती है - बस एक सहज विचार संकलन जैसा, पूर्णत: स्वाभाविक रूप में!

यदि यह माना जाय कि लेख जनता के ज्ञानवर्धन के लिये है, मनोरंजन के लिये है तब कुछ कुछ अपेक्षा भी होना स्वाभाविक है पर चिट्ठे के इस श्रेणी तक पहँचते-पहँचते चिट्ठाकार वैसे ही लोकप्रिय हो चुका होता है और टिप्प्णी की कमी उसे नहीँ रहती, न ही उसका लेखन टिप्प्णियों की संख्या से प्रभावित होता होगा, ऐसा मेरा अनुमान है (अब हम इसमें अधिक कैसे जान सकते हैं, हम तो उस स्तर के हैं नहीँ) रवि जी इसमें अग्रगण्य हैं। वैसे उन्मुक्त जी का चिट्ठा भी इसी प्रकार का है और उड़नतश्तरीफुरसतिया के लिये तो बिना टिप्प्णी का लेख लिखना एक चुनौती ही है! हिम्मत हो तो स्वीकारें इसे ;)

2 - टिप्प्णी की अपेक्षा

दरअसल यह अपेक्षा ही मूल है, निराशा का भी (यदि अपेक्षा पूरी न हुयी) और प्रोत्साहन का भी / लोभ का भी (यदि अपेक्षा पूरी हो गयी तब भी)। यह बहुत कुछ लेखन के उद्देश्य से जुड़ा है। यह माना जाय कि यदि कोई लेख स्तरीय हुआ तो टिप्प्णी मिल ही जायेंगी, अन्यथा नहीँ। हम तो अपने विचार वैसे भी लिख ही रहे थे, कि कभी भविष्य में हम ही उनका अवलोकन कर लेंगे। मैं अन्य की तो नहीँ कहता पर अपनी तो कोई अपेक्षा है नहीँ - "जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला"

3 - कब और क्या टिप्पणी दें
मेरे विचार से टिप्पणी देनी तभी चाहिये जब कभी वास्तव में हम लेख की आलोचना अथवा प्रशंसा करना चाहते हों, इसमें उदारता / कृपणता का स्तर भिन्न हो सकता है - अथवा यदि हम लेख से संबन्धित कुछ जोड़ सकते हैं अथवा कुछ सुधार जैसे सुझाव दे सकें, सम्बन्धित लेखों की कड़िया दे सकें तभी टिप्पणी दें। कभी कभी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ विचार स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं, उन्हें रोकने की आवश्यकता नहीं, टिप्पणी द्वारा तुरंत अपने विचार व्यक्त किये जायें। हम तो इसमें भी बहुत आलसी हैं, मन तो बहुत होता है, कई बार टिप्प्णी लिखते-लिखते थक जाते हैं (यदि टिप्प्णी को भी ड्राफ्ट की तरह सहेजने की व्यवस्था हो तो फिर टिप्पणी भी किश्तों में करें हम तो)

4 - नवोदित चिट्ठाकारों का प्रोत्साहन
यह कारण तो तर्कसंगत जान पड़ता है। चिट्ठाकार के पहले 2-4 चिट्ठों पर तो यह ठीक है, इस प्रकार वह यह तो समझ ही लेगा कि उसका चिठ्ठा पाठकों की दृष्टि में तो है। कभी कभी इस उद्देश्य से तो टिप्पणी की जा सकती है पर मात्र "रसीद" के रूप में ठीक नहीं। जैसा कि टिप्प्णीकार ने अपने शीर्षक में लिखा "वाह वाह” या “लिखते रहें” से बेहतर है चुप्‍पी", मैं तो उसे ठीक समझता हूँ। यदि नवोदित चिट्ठाकार भी यह समझ लें कि चिट्ठे का उद्देश्य मात्र टिप्प्णी व लोकप्रियता नहीँ, वरन विचारों का संकलन है तो लेखन सहज व स्वाभाविक रहेगा।

5 - पाठकों का आवागमन
संजय जी द्वारा उठाया गया यह प्रश्न वास्तव में ठीक है। कुछ स्तर तक तो एनालिटिकस (Google Analytics) व अन्य औजार बता सकते हैं, पर पाठक की पहिचान नहीँ। यदि पाठक मात्र यह बताना भी चाहें कि उन्होंने लेख/कविता पर दृष्टिपात कर लिया है, अथवा गंभीरता पूर्वक पढ़ भी लिया है तो टिप्प्णी देना एक सरल उपाय है। पर टिप्प्णी को मात्र इसीलिये प्रयोग किया जाय? मैं स्वयं अनिश्चित हूँ। हाँ, यदि चिट्ठाकार / टिप्प्णीकार यह मान ले कि कोई फर्क नहीँ पड़ता चाहे कोई पढ़े अथवा नहीँ, तो इस समस्या से भी निजात। वैसे रवि जी ने एक सरल उपाय भी बताया था किलकाती टिप्पणियाँ शीर्षक से।

6 - हिन्दी व अंग्रेज़ी चिट्ठों की तुलना
मेरे विचार से यह एक गंभीर मसला है। क्यों हम इतनी आशा करते हैं मात्र टिप्पणियों की? क्यों जुगत लगाते हैं? क्यों नहीँ स्वाभाविक रूप से लेखन, पाठन व टिप्पणियाँ होने देते? क्यों इनको आपसी सम्बन्धों का मापक मान लेते हैं? हिन्दी चिठ्ठाकारी में शायद यह परम्परा व हमारी सामाजिक संस्कृति से आ गया है।

यदि अंग्रेजी चिट्ठाजगत को देखें तो अनेकानेक चिठ्ठे व अनेकानेक लेख महीनों टिप्प्णीशून्य रहते हैं। यह बात नहीँ कि वे सभी स्तरहीन हैं। मैंने अनेकों बार तकनीकी व अन्य विषयों सम्बन्धी ऐसे चिट्ठे देखे हैं जो कि सारगर्भित होते हुए भी टिप्प्णीशून्य थे। ऐसा मानना ग़लत होगा कि वे कभी पढ़े ही नहीं गये, पर अधिकांशत: औपचारिकता के लिये टिप्पणी की गयी हो ऐसा अपेक्षाकृत कम पाया है मैंने - विशेषकर नियमित चिट्ठाकारों में। हिन्दी चिट्ठाजगत में है यह धारणा।

कदाचित् अंग्रेज़ी चिट्ठाजगत के विस्तार, वैविध्य के कारण ऐसा हो। हाँ, पर उनमें भी सन्दर्भ होने पर पारस्परिक कड़ियाँ अधिकांशत: पायी जाती हैं। कई चिट्ठों में बहुत-बहुत समयांतराल बाद भी, पर नियमित रूप से टिप्प्णियाँ बरसती हैं - यह भी हिन्दी चिट्ठाजगत में होता तो है पर कम ही, मेरे अनुमानित विश्लेषण से रवि जी के चिट्ठे पर ऐसा पाया जाना स्वाभाविक है। क्या कारण हैं इसके? यदि विषयों से बंधा हुआ, सारगर्भित लेखन होगा तो टिप्पणी हो न हो, पाठक पहुँचेंगे अवश्य ही - आज नहीं तो भविष्य में। ऐसे आश्वस्त रह कर मात्र गुणवत्ता की ओर ध्यान दिया जाय। मात्र औपचारिक टिप्प्णियों को कुछ कम करें तो शायद विविधता और गुणवत्ता में और भी सुधार हो।

7 - समीर जी की टिप्प्णियाँ
समीर जी की टिप्प्णियाँ अपवाद हैं। ये वास्तव में विशेष स्थान रखती हैं वह तकनीकी कारणों से भी। चूंकि वे टिप्प्णी के मामले में दानवीर कर्ण, राजा हर्षवर्धन से भी आगे है, बिन माँगे ही सब कुछ दे देते है इसलिये अब तो उनसे टिप्प्णी की अपेक्षा अवश्य ही करनी चाहिये और अब तो समीर जी यह अघोषित दायित्व हो ही गया है ;) यदि समीर जी की टिप्प्णी न मिले तो हम तो समझते हैं कि कोई तकनीकी लोचा है, शायद यह पोस्ट कनाडा में दिख नहीँ रही, अन्यथा उनकी टिप्पणी आती अवश्य, सो पुन: चिट्ठे की तकनीकी जाँच आवश्यक हो जाती है!

8 - टिप्प्णीशून्य लेख / चिट्ठा
मसिजीवी का कभी कभी अनहिट, निर्लिंक व टिप्‍पणीशून्‍य भी लिखें- अपने लिए
मुझे अच्छा लगा। बहुत आनंद रहता है अपने लिये लिखने में, और जो टिप्प्णीशून्य भी हो। अजी, टिप्प्णीशून्य लेख का आनन्द तो बहुत उच्च कोटि का है। मैंने भी लिखा है कुछ टिप्पणीशून्य - बिलकुल ऐसा लगता है कि आपने एक विशाल धनराशि (लेखक के दृष्टिकोण से) को बिना ताले, खुले में छुपा रखा है और कोई उसकी तरफ देख भी नहीँ रहा! अब फ़ुरसतिया, जीतू, रवि जी, व समीर जी तो ऐसा आनन्द पाने से रहे। तो आप इसी से प्रसन्न रहिये कि जो नामचीन चिट्ठाकार नहीं पा सके (और अब पा भी नहीँ सकते, जब तक वे छ्द्म नाम से नहीँ लिखते) वे आप अनायास ही पा जाते हैं, और पाते रह्ते हैं जब तक भूले-भटके ग़लती से कोई टिप्प्णी नहीं कर देता। वाह! क्या बात है!

एक बात और भी, एक चलचित्र (दिल चाहता है) का यह संवाद लेख के टिप्प्णीशून्य रहने पर ही पर लेख की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है -

परफेक्शन में इंप्रूवमेंट का स्कोप नहीँ रहता

8 - अन्य चिट्ठाकारों के लेख

कुछ अन्य पठनीय लेख जो पूर्व में अन्य चिट्ठाकारों द्वारा टिप्पणी, लोकप्रियता, पारस्परिक टिप्पणी आदि विषयों पर लिखे गये हैं, इनमें व्यंग्यात्मक व गंभीर दोनों ही हो सकते हैं (यदि कुछ रह गये हों तो संज्ञान में आने पर जोड़ दिये जायेंगे)

टिप्पणी-निपटान की जल्दी
चिठ्ठे का टी आर पी
रेडीमेड टिप्पणियाँ
हिंदी में चिट्ठाकारी के कारण पर विचार
पीठ खुजाना: पारस्परिक टिप्पणी
टिप्पणियों के जुगाड़

इसके अतिरिक्त भी बहुत लोगों ने - समीर लाल जी, जीतू जी, रवि जी, फुरसतिया जी, आलोक जी, ज्ञान जी आदि ने भी इन विषयों पर तथा नुस्खे आदि पर एकाधिक बार लिखा है - जिन खोज तिन पाईयाँ, हमने तो पढ़ा था, पर खोज नहीँ पाय।

अब और लिखा नहीँ जाता, दिमाग का क्या है, भागता ही रहता है।


अस्वीकरण
पुन: यह स्माइली ;) चुनौती के लिये - यह मात्र लेखन के लिये है कोई दंगल की चुनौती नहीँ