सोमवार, 19 फ़रवरी 2007

सर मुँड़ाते ही ओले पड़े

पहले ही अपने आप से कहा था,

बच्चू! इस ब्लॉगिंग-वॉगिंग, चिठ्ठाकारी, लिखने, टीका-टिप्पणी आदि में मत पड़ो, बस चुपचाप पढ़ते रहो और बाकी अपने काम से काम रखो।
पर नहीं मानी, तुमने मुफ्त में मिलने वाली अपने भले की राय।

जुमा-जुमा अभी चंद दिन ही हुए थे पहली पोस्ट को- एक नवजात चिठ्ठा ही तो था। कुल जमा दो ही पोस्ट लिखी थीं, और न कोई और लिखने का इरादा ही था। पर होनी को कौन टाल सकता है - अब तो दबोच ही लिया गया। आखिर नामित (टैग) कर ही दिया, उन्मुक्त जी के इस आदेश ने! एक-दो नही, पूरे पाँच प्रश्नों के साथ। इसी को न कहते हैं- सर मुँड़ाते ही ओले पड़े, इससे अच्छा उदाहरण तो हो ही नहीं सकता, मेरे पास। अब तो मुझे यह आदेश मानना ही पड़ेगा।

आखिर क्यों भला...?

यदि मुझे प्रश्नों के उत्तर न पता होते तो ठीक ही था, पर बखूबी याद है मुझे विक्रम-वेताल की कथाएं, वेताल के प्रश्न और विक्रम की दुविधा -
राजन्, यदि इस प्रश्न का उत्तर तुमने जानते हुए भी नहीं दिया तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे

या कि फिर चिट्ठाजगत का निम्न संस्करण

चिठ्ठाकार, यदि इन प्रश्नों का का उत्तर तुमने जानते हुए भी नहीं दिया तो तुम्हारे चिठ्ठे से टिप्पणियाँ ग़ायब हो जायेंगी (चिठ्ठाकार: कोई बात नहीँ, हैं ही कितनी जो भय हो?) और तुम्हारा चिठ्ठा पढ़्ने का अधिकार भी समाप्त हो जायेगा (यह गम्भीर चेतावनी थी)

या कि यक्ष द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को दी गयी चेतावनी और तदुपरांत पूछे गये प्रश्न

(क्षमा करें, मैं प्रश्नकर्त्ता या अपनी कोई तुलना नहीँ कर रहा, केवल परिस्थिति का साम्य सोच रहा हूँ)

दूसरा कारण यह कि उत्तर देने के बाद ही तो अधिकार मिलेगा - औरों को चक्रव्यूह में फंसाने का

अभी कुछ को तो पहले ही लपेटना पड़ेगा, "क्या करें... कंट्रोल ही नहीं होता"!

सुख - चैन के दिन

मैं तो हिन्दी लेखों का एक उन्मुक्त पाठक था, (नहीँ जी, वो हिन्दी चिठ्ठे वाले उन्मुक्त नहीँ... वे उन्मुक्त नहीं, प्रमुख अभियुक्त हैं)। जहाँ मन करता, मैं वहाँ क्लिक करता, पढ़ता, अच्छा बहुत लगता, अधिकतर रुचिकर लेख मिलते, परंतु कहीँ-कहीँ पर मन बहुत मचल जाता और एक-आध टिप्पणी वगैरह चस्पा पर देता, और मस्त विचरण करता, ये पढ़, वो पढ़...। एक रुचिकर और अत्यधिक लोकप्रिय के चिठ्ठे को ही लें कई बार पढ़ा, पर टिप्पणी नहीं की। इस बात का खुलासा तो लेखक जो कि पूर्व परिचित भी थे, से मैंने लगभग एक वर्ष बाद ई-मेल से किया, वे तो वर्षों से सम्पर्क में ही नहीं थे।

अब दृश्य पटल पर मुलाकात होती है... अतुल, उन्मुक्त जी, शुकुल उर्फ फुरसतिया जी, सागर वगैरह...। बहुत उकसाया... सभ्य भाषा में, बोले तो... प्रोत्साहित किया... कभी अपने लेखों द्वारा, कभी अन्यान्य चिठ्ठोँ पर टिप्पणी, प्रति-टिप्पणी द्वारा, कभी ई-मेल द्वारा और कभी दूरभाष से (नाम नहीँ लूंगा, जिन्होंने उकसाया वे स्वयं जानते हैं।) यह भी बाद में मालूम हुआ कि कुछ परोक्ष में बैठे, बड़े दिनों से मुर्गा फंसने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पर हम भी थे कि "ऐसे कौनो हमें फ़ंसाय सकत है?" की भावना से और न्यूटन के जड़त्व के सिद्धांत के अनुरूप अटल थे।

बचपन में एक किस्सा सुना था जो लगभग इस प्रकार है -
एक गाँव में एक ऐसा व्यक्ति आया जिसकी नाक कटी हुई थी। उस व्यक्ति को लोग उपेक्षा-दया मिश्रित आश्चर्य से देखते। उस व्यक्ति ने कुछ लोगों को समझा-बुझा कर बताया कि उसे भगवान के सक्षात दर्शन होते हैं। उन्होंने जब इसका रहस्य पूंछा तो उसने बताया कि नाक के कटवाने से भगवान के दर्शन और वह भी सह्ज-साधारण ही होते हैं, जब भी चाहो तब। यही नहीं, ऐसा करने से भगावान से सहज ही साक्षात्कार और वार्तालाप भी संभव है।

लोगों में बड़ा कौतूहल हुआ, नाक कटवाने की इच्छा भी हुई, पर त्वरित साहस न हुआ। कुछ समय बाद उनमें से एक युवक साहस जुटा कर उस व्यक्ति के पास आया और भगवान दर्शन तथा साक्षात्कार के लालच के चलते अपनी भी नाक कटवाने का मनोरथ बताया। खैर, उसकी नाक कटवाई गई। युवक ने पीड़ा को भी सहन किया। तदुपरांत नव-युवक ने कहा कि उसको तो भगवान नहीँ दिखाई दे रहे। तब उस प्रथम व्यक्ति ने उत्तर दिया "भगवान तो मुझको भी नहीँ दिखते, पर क्या करूँ, मुझको नाक वालों से ईर्ष्या होती थी तो मैंने यह कहना प्रारम्भ कर दिया। अब जाने दो इस बात को, तुम्हरी भी अब नाक कट गयी है, तुम भी आज से सभी से यही कहोगे कि तुमको भी भगवान दिखने लए हैं। फिर देखना... और लोग भी जुड़ने लगेंगे अपनी बिरादरी में।"
इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है...? खैर, मैंने नहीं मानी इसकी भी शिक्षा...
(इस दृष्टांत को हाल ही में सम्मानित एक अन्य हिन्दी चिठ्ठे के विषय-संदर्भ से किंचित भी न जोडें, कदाचित विषय-वस्तु में समानता का आभास हो सकता है)

सर का मुँड़ना
जब शातिर बहेलिये जाल बिछायें, और जतन करें तो आप का फंसना स्वाभाविक ही है। बकरे की माँ आखिर कब तक खैर मनाती। ऊपर वाले ने बहेलियों की दुआ कुबूल की। मैंने पहली पोस्ट की - अपने मास्टर साहब पर, और... फंस गया जाल में! यह पोस्ट मात्र एक श्रद्धांजलि के रूप में थी, मेरी क़तई मंशा नहीं थी आगे और कुछ लिखने की। चिट्ठे का नाम जब सोचा तब कई तो मिले ही नहीँ, तब ऐसे नामों से समझौता किया कि जो कि वास्तव में कैज़ुअल मन: स्थिति को दर्शाता था कि यह सब टेम्परेरी (तदनुसार, अंतरिम) है, कोई शाश्वत प्रयास नहीँ। वैसे भी है तो सब कुछ अंतरिम ही!
यह पक्के तौर पर कह दिया था अपना उत्साहवर्धन करने वाले शुभाकांक्षियों से, "बस और नहीं...। मैं नहीँ कर सकता चिठ्ठाकारी वगैरह ।" अपने आप से भी घोषणा कर दी और समझा भी दिया "हो गयी मंशा पूरी, अब तो चुप बैठ जाओ...। "
मैं तो समझ ही गया, पर शुभाकांक्षी कहाँ मानने वाले थे। जब तक रोग पूरी तरह से जकड़ न ले। अभी भी मुर्गे में पुन: स्वतंत्र होने की कुछ सम्भावनायें दिख रही थीँ। कभी कहते - अगली पोस्ट का इंतज़ार है, तो किसी ने पूछा - कहाँ गायब हो गये? अब और नाम नहीँ लूंगा। कभी बात होती तो कोई सज्जन (मैं जानता हूं कि वे पढ़ेंगे इसे अवश्य ही) कहते "और लिखो भई... कुछ भी लिखो"। मैंने भी उनको हतोत्साहित किया - "अगर लिखा तो बिहारी-सतसई जैसे गागर में सागर लिये 9-2-11 की माफिक शॉर्टहैंड में कोशिश करूंगा", पर यह है इतना आसान थोड़े ही, जैसा कहने में लगता है।

"अब और क्या लिखूँ?" मैं सोचता। खैर विषाणुओं ने अपना असर दिखाया और कुछ ऐसा लगा कि "चलो, एक मुख़्तसर सी बात है वही लिख दी जाय...", सो एक बार और लिख दिया, कुछ सुगन्धित डाक-टिकटोँ पर और निश्चय कर लिया -
अब यदि लिखा भी... तो...तो... । नहीँ-नहीँ... ऐसी अनर्गल बात नहीँ सोचते कभी... और पूर्ण विराम।
ओले पड़ना
यहाँ तक तो ठीक-ठाक था, अचानक उन्मुक्त जी की कृपा-दृष्टि मुझ पर पड़ी... वे सोचने लगे... "आखिर नाम तो मेरा है उन्मुक्त, लिखता भी हूँ मैं उन्मुक्तता से, पर वास्तव में है यह प्राणी मौज में। एक-आध पोस्ट क्या लिख दी, इतिश्री समझ ली अपने कर्तव्यों की। बस कभी-कभार अपना अधिकार दिखाते हुए, टिप्पणी वगैरह कर देता है और कभी-कभी मीन-मेख निकाला करता है, और मजे में विचरण करता है। चलो पकड़ लो इसे"

अचानक, बिना किसी पूर्वाभास के, अपने ई-मेल में और अन्य एक शुभाकांक्षी द्वारा, उन्मुक्त जी के फरमान की सूचना मिली - जोर का झटका धीरे से लगे , जिसकी परिणति यह चिठ्ठी है।

उत्तर न मालूम होते तो ठीक ही था, पर कम-से-कम दो प्रश्नों के तो मालूम ही हैं, और शेष के भी विचारे जा सकते है, सो उत्तर तो देना होगा ही... नहीं तो... विक्रम और वेताल !
आज पुन: अपने से कहता हूँ "नहीँ माने बरखुरदार!... पड़ गये ब्लॉगिंग के ग्लैमर में... अब भुगतो खमियाजा!"
पुनश्च संकल्प: फिलहाल यही सोचा है कि उत्तर देना तो नितांत आवश्यक है, पर उसके बाद अब तो हम मान जायें... इसी में सबकी भलाई है। और वैसे भी - जब है नहीं ग़ज़ल कोई कहने को, तो क्या करें महफ़िल में जा कर

लेख न चाहते हुए भी, बड़ा हो गया है, अत: प्रश्नों के उत्तर और किनको टैग (नामित) करना है... बाद में...
(क्या बहाना ढूढा है, फिलहाल बचने का)

आगे आयें और बतायें कि कौन-कौन फंसना (अथवा नहीं फंसना) चाहता है। पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर वरीयता दी जायेगी। नामित करने का एकाधिकार लेखक के पास सुरक्षित है ।

अस्वीकरण (Disclaimer): कृपया इस चिठ्ठी में उल्लिखित व्यक्तियों के बारे में अन्यथा न लें, यह वर्णन मात्र परिहास-विनोद के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है। सभी इंगित चिठ्ठाकार सम्मानित और लोकप्रियता के मापदण्ड पर अग्रगण्य हैं।

8 टिप्‍पणियां:

Shrish ने कहा…

खूब जी व्यंग्य भी लिखते हैं आप तो, अब तो हम आपको बिना लिखे बैठने नहीं देंगे। वैसे किसी महान आदमी ने कहा है, "कानपुर वाला हो और व्यंग्य न लिखे ये मुमकिन नहीं इस जहाँ में।"

अनूप शुक्ला ने कहा…

अरे क्या लिखते हो महाराज!मौज आ गयी। अब कौन बचायेगा आपको लिखने से। यह भी ताज्जुब कि १६ फरवरी को पोस्ट लिख दी और हमें पता ही नहीं चला। बहुत लापरवाह हैं हम भी। बहरहाल, अब बहुत अच्छा लग रहा है और यह लेख पढ़कर जी खुश हो गया। अब अगले लेख का इंतजार है!

rachana ने कहा…

इतना अच्छा लिखते हैं और लिखना नही चाहते! किसी को फाँसे या न फाँसे, जवाब जरूर दीजियेगा!

उन्मुक्त ने कहा…

मैं अपने सवाल के जवाबों का इंतजार कर रहा हूं।

miredmirage ने कहा…

राजीव जी इतना अच्छा लिखने वालों को कोई जाने नहीं देगा । आरम्भ से अन्त तक बाँधे रखने का गुण है आपकी कलम में या यूँ कहें आपके की बोर्ड में । अब तो बस लिखते जाइये ।
घुघूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com
miredmiragemusings.blogspot.com/

उडन तश्तरी ने कहा…

कैसे भी सही, अटके सही हो. ऐसा धांसू लिखते हो, वैसे इसमें आपकी नहीं, कानपुर के पानी की गलती है, तो काहे नहीं लिखोगे. लिखना ही पडेगा. लिखते चलो भाई, आपकी बहुत जरुरत है. :) वैसे उन्मुक्त बाबू के जवाब तो दो?? हा हा :)

राजीव ने कहा…

@श्रीश जी,
समीर जी,

दरअसल कानपुर वाला व्यंग्य कहता ही नहीं है, सीधे-सादे शब्दों में अपनी रोजमर्रा के तरीके से लिखता है, बोलता है और व्यवहार करता है - अब यह हमारा आम तरीका / रोजमर्रा का जीवन ही ऐसा हो चला है कि उसने व्यंग्य का रूप ले लिया!

@रचना जी,
उन्मुक्त जी
जवाब तो अब दे ही दिया। अभी-अभी तो इस सजा को काटकर, उत्तर स्वरूप आज की पोस्ट की, तब जा क यहां टिप्पणी की है।


@घुघूती बासूती जी,
ज़ी ठीक है, परंत्तु आपको भी मैंने प्रश्नावली दे दी है... अभी तो आपको लिखने है उत्तर। आपका ईं-मेल न होने से सीधे सूचना नहीं दे पाया हूँ

सागर चन्द नाहर ने कहा…

आप ने १६ फरवरी से लिखना शुरु किया और हमें पता ही नहीं चला; अब बचके कहाँ जाओगे वो अपने रतलामी जी और समीर लाल जी कहते हैं ना

ब्लागिंग कि दुनिया वो दुनिया है दोस्त, जहाँ चार पोस्ट तक तो सब संभव है, उसके बाद लौटना संभव नही, अभी भी संभल जाओ....

मैदाने जंग में शहसवार वो ही जीतते हैं जो चार दिन के इनीशियल यूफ़ोरिया को झेल लेते हैं...


बहुत हँसी आई आपके इस लेख को, अब नियमित लिखना ही होगा वरना मैं फिर से टंकी...... याद है ना?
॥दस्तक॥