शनिवार, 21 अप्रैल 2007

तमसो मा ज्योतिर्गमय

फिर बिजली गुल!

आजकल तो गर्मियों का मौसम है, जब हमारे शहर और प्रदेश में साल के बाकी महीनों में बिजली की किल्लत हो तो गर्मियों में तो भगवान ही मालिक है। अब तो सुनते हैं कि और प्रदेशों व शहरों में भी बिजली की बहुत मारा-मारी है, खैर इस मामले में तो कानपुर के शहरी तो बहुत तजुर्बेकार है, औरों को अभी इस तजुरबे में शायद वक्त लगे।

कहाँ पड़ गये हम भी घिसी-पिटी, पुरानी बकवास को ले कर। अब चालू ही करी है तो इससे मिलता हुआ एक किस्सा ही हो जाये।

पिछले दिनों हम एक कार्यक्रम में शरीक हुए। वहाँ पर कुछ सामयिक व अन्यान्य विषयों पर चर्चा भी हुयी। एक सज्जन ने एक हास्य घटना सुनायी

एक माँ ने अपने पुत्र से, जो कि कक्षा 10 का छात्र था, एक प्रश्न किया -
"तमसो मा ज्योतिर्गमय... संस्कृत के इस सद् वाक्य का अर्थ बता सकते हो।"

रात का समय था, संयोग से बिजली भी चली गयी और अंधेरा छा गया

पुत्र बोला - "हाँ, क्यों नहीं माँ, बहुत आसान है, इसका अर्थ है कि -
माँ, तुम सो जाओ, (तमसो मा) बिजली चली गयी है (ज्योतिर्गमय) "

माता ने झल्ला कर कहा, "तुझे कुछ नहीँ मालूम, कल ठीक से पढ़ कर बताना"

अगले दिन दोपहर का समय था -

माँ - "क्यों बेटा, अब पढ़ लिया, अब तो बताओ कि तमसो मा ज्योतिर्गमय का क्या अर्थ है"

पुत्र - "हाँ, कल कुछ ग़लती हो गयी थी, इसका अर्थ है -

माँ, तुम सो जाओ (तमसो मा), मैं ज्योति के साथ जा रहा हूँ (ज्योतिर्गमय) "

इस घटना मैंने अपने एक मित्र को भी बताया, अभी उसके वास्तविक अर्थ पर बात नहीं हुयी थी। वहाँ पर उन मित्र का पुत्र भी मौजूद था, जब उससे भी यह प्रश्न किया गया, तो वह तपाक से बोला -

"इस स्लोगन को कहीँ देखा है, - हो न हो, यह भैया के स्कूल का ही स्लोगन है!"

अब देखते हैं कि देश के अन्य भावी कर्णधारों का क्या मत है इस विषय पर।

8 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

पिछले साल इसी मौसम में कानपुर आया था-तब यह कहानी बन गयी थी:

http://udantashtari.blogspot.com/2006/08/blog-post_115533488750333181.html

--बहुत दिन बाद आप दिखे. कहाँ गायब हैं?

-बढ़िया लिखा है. :)

Reetesh Gupta ने कहा…

अच्छा लगा पढ़कर ...धन्यवाद

Shrish ने कहा…

बहुत दिन बाद दिखे। किस्सा रुचिकर रहा। बिजली की समस्या तो भारत की शाश्वत समस्या है। कुछ जगहों को छोड़कर ज्यादातर जगह यही हाल है।

Raviratlami ने कहा…

इसका एक और अर्थ हो सकता है -

सरकार, जो बिजली बनाती बेचती है उसका कहना होता है - खासकर तब जब जनता प्रेम से सोने लगती है :

तुम सोओ मत! बिजली चली गई है.

Mired Mirage ने कहा…

आप तो बिजली से भी लम्बे समय के लिए गायब हो जाते हैं । एक बार फिर से स्वागत है आपका ।
घुघूती बासूती

पूनम मिश्रा ने कहा…

अच्छा किस्सा है.यह न सिर्फ हमारे देश की बिजली के लुप्त होने पर टिप्पणी है बल्कि हमारी विरासत के लुप्त होने पर भी

राजीव ने कहा…

सभी पाठकों और टिप्पणीकर्त्ताओं का धन्यवाद।


उडन तश्तरी जी,

आपने भी यहाँ का हाल-ए-बिजली खूब बयाँ किया है।


रवि भाई, आपने तो एक और ही मायने दिये इस सद् वाक्य को!


पूनम जी,
आपने ठीक ही कहा प्रथम दृष्टया यह अपनी विरासत के लुप्त होने का ही दु:खद बयान है। बिजली के आने-जाने के तो आदी हो गये, पर क्या अपने भावी कर्णधारों की ऐसी प्रगति और संस्कृति के प्रति लुप्त-प्राय जागरूकता के भी?

एक बात और ग़ौर फरमाई जाय, यह संयोग ही है कि विद्युत-विभाग से जुड़े पाठकों की नज़र इस आलेख पर अपेक्षाकृत अधिक ही पड़ी ;)

अतुल शर्मा ने कहा…

गनीमत है बच्चा इस सूक्ति को स्लोगन के रूप में जानता है। हमारी सांस्कृतिक विरासत के बिजली जैसे गुल होते जाने के जिम्मेदार भी हम ही हैं। हम बच्चों को स्कूल भेज इतिश्री कर लेते हैं कि बस अब इंजीनियर या डॉक्टर ही बन कर निकलेगा। केवल वही पढ़ना है जो इन लक्ष्यों की ओर ले जाए बाकी सब बेमानी है। लगभग ऐसी ही सोच रह गई पालकों की, जबकि बहुत सी बातें घर पर बताई सिखाई जा सकतीं हैं। कई बार लोग अपनी‍ ही संस्कृति को पिछड़ापन मान लेते हैं। हिन्दी या संस्कृत में जो भी है सब पिछड़ेपन की निशानी है। कोई भी फिल्म देख लें, उसमें हिन्दी या संस्कृत के अध्यापक को विदूषक के रूप में ही दिखाया जाता है।
शायद बहुत अधिक लिख गया मैं, जबकि अभी तो और भी लिखने को।