सोमवार, 17 सितंबर 2007

जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला (उड़नतश्तरी व फुरसतिया को चुनौती)

बहुत दिनों से चिट्ठा और टिप्पणी पर पढ़ ही रहा था, यूँ कहें कि विगत दो अथवा अधिक वर्षों से इस विषय पर अलग अलग विद्वान चिट्ठाकारों ने अपनी राय दी और हम इन्हें पढ़ते रहे, चुपचाप इन विचारों को आत्मसात करते रहे।

एक बार पुन: शास्त्री जी के लेख और उन पर होने वाली टिप्पणियों और प्रति-लेख को पढ़ने पर कुछ-कछ ब्राउनियन-गति जैसा अनुभव हुआ (कणों की पारस्परिक गति, जिसमें वे एक दूसरे से टकराकर ऊर्जा, गति व दिशा में बदलाव करते हैं) कुछ टिप्पणी, कुछ चिट्ठे, कुछ उन पर भी टिप्पणी। सरसरी तौर पर पढने से तो जो ऊर्जा मिली उसको तो अवशोषित कर लिया और शांत बैठे रहे, पर पुन: पढ़ने पर लिखने भर की ऊर्जा मिल ही गयी।

संदर्भ के लिये हालिया चिट्ठों की कुछ सिलसिलेवार कड़ियाँ:

शताब्दियों पहले जेम्स वॉट ने कभी भाप की शक्ति को जाना, प्रयोग किया फिर कई और अन्वेषण हुए, बहुत शोध होते रहे, यांत्रिक अभियांत्रिकी का विकास हुआ और समाज के ज्ञान का स्तर बढ़ता रहा। प्रयोग और अनुसंधान जारी हैं और रहेंगे।

ठीक वैसे ही चिट्ठाकारी से संबंधित ट्प्पिणियों पर, टिप्पणियों की अपेक्षा पर, टिप्पणियों के महत्व पर, पारस्परिक टिप्पणियों के आदान प्रदान पर, टिप्पणियों के मापदण्ड पर, लोकप्रियता बढ़ाने पर, हिट काउंटर्स आदि विषयों पर धीरे धीरे चिट्ठाजगत में परिमार्जित / परिवर्धित विचार प्रस्तुत होते रहे। चिट्ठाजगत में भी टिप्पणियों पर शोध जारी है। नये शोध से नये सिद्धांत भी प्रतिपादित होते रहे हैं।

ख़ैर, हमारे पास तो कोई विश्लेषण नहीँ है, पर अपने विचार ही लिखता हूँ -

1 - चिट्ठा लिखने के उद्देश्य
भिन्न लेखकों के भिन्न उद्देश्य हो सकते हैं। अधिकतर चिट्ठाकार संभवत: स्वांत: सुखाय लिखते हों, कभी किसी ने कहा कि ऐसा नहीँ होता, यदि ऐसा ही हो तो वे डायरी लिखना पसंद करें। कुछ प्रतिक्रिया स्वरूप लिखते हैं। हम तो "ऐसे ही" लिखते हैं (अव्वल तो लिखते ही नहीँ) यदि लेखक मात्र इस उद्देश्य से लिखें कि चिट्ठा तो केवल उसका विचार/ लेख संकलन है तब न तो कोई अपेक्षा होगी न क्लांति। बस, हम चिट्ठे को अपनी डायरी ही मान लें, इस सुविधाके साथ कि उसके संपादन के लिये यह मात्र एक तंत्राश है, कोई कभी पढ़ भी ले तो कोई उज्र नहीँ।

सुनील दीपक जी के चिट्ठे पर अधिकांशत: सहजता और सरलता की छाप दिखती है - बस एक सहज विचार संकलन जैसा, पूर्णत: स्वाभाविक रूप में!

यदि यह माना जाय कि लेख जनता के ज्ञानवर्धन के लिये है, मनोरंजन के लिये है तब कुछ कुछ अपेक्षा भी होना स्वाभाविक है पर चिट्ठे के इस श्रेणी तक पहँचते-पहँचते चिट्ठाकार वैसे ही लोकप्रिय हो चुका होता है और टिप्प्णी की कमी उसे नहीँ रहती, न ही उसका लेखन टिप्प्णियों की संख्या से प्रभावित होता होगा, ऐसा मेरा अनुमान है (अब हम इसमें अधिक कैसे जान सकते हैं, हम तो उस स्तर के हैं नहीँ) रवि जी इसमें अग्रगण्य हैं। वैसे उन्मुक्त जी का चिट्ठा भी इसी प्रकार का है और उड़नतश्तरीफुरसतिया के लिये तो बिना टिप्प्णी का लेख लिखना एक चुनौती ही है! हिम्मत हो तो स्वीकारें इसे ;)

2 - टिप्प्णी की अपेक्षा

दरअसल यह अपेक्षा ही मूल है, निराशा का भी (यदि अपेक्षा पूरी न हुयी) और प्रोत्साहन का भी / लोभ का भी (यदि अपेक्षा पूरी हो गयी तब भी)। यह बहुत कुछ लेखन के उद्देश्य से जुड़ा है। यह माना जाय कि यदि कोई लेख स्तरीय हुआ तो टिप्प्णी मिल ही जायेंगी, अन्यथा नहीँ। हम तो अपने विचार वैसे भी लिख ही रहे थे, कि कभी भविष्य में हम ही उनका अवलोकन कर लेंगे। मैं अन्य की तो नहीँ कहता पर अपनी तो कोई अपेक्षा है नहीँ - "जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला"

3 - कब और क्या टिप्पणी दें
मेरे विचार से टिप्पणी देनी तभी चाहिये जब कभी वास्तव में हम लेख की आलोचना अथवा प्रशंसा करना चाहते हों, इसमें उदारता / कृपणता का स्तर भिन्न हो सकता है - अथवा यदि हम लेख से संबन्धित कुछ जोड़ सकते हैं अथवा कुछ सुधार जैसे सुझाव दे सकें, सम्बन्धित लेखों की कड़िया दे सकें तभी टिप्पणी दें। कभी कभी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ विचार स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं, उन्हें रोकने की आवश्यकता नहीं, टिप्पणी द्वारा तुरंत अपने विचार व्यक्त किये जायें। हम तो इसमें भी बहुत आलसी हैं, मन तो बहुत होता है, कई बार टिप्प्णी लिखते-लिखते थक जाते हैं (यदि टिप्प्णी को भी ड्राफ्ट की तरह सहेजने की व्यवस्था हो तो फिर टिप्पणी भी किश्तों में करें हम तो)

4 - नवोदित चिट्ठाकारों का प्रोत्साहन
यह कारण तो तर्कसंगत जान पड़ता है। चिट्ठाकार के पहले 2-4 चिट्ठों पर तो यह ठीक है, इस प्रकार वह यह तो समझ ही लेगा कि उसका चिठ्ठा पाठकों की दृष्टि में तो है। कभी कभी इस उद्देश्य से तो टिप्पणी की जा सकती है पर मात्र "रसीद" के रूप में ठीक नहीं। जैसा कि टिप्प्णीकार ने अपने शीर्षक में लिखा "वाह वाह” या “लिखते रहें” से बेहतर है चुप्‍पी", मैं तो उसे ठीक समझता हूँ। यदि नवोदित चिट्ठाकार भी यह समझ लें कि चिट्ठे का उद्देश्य मात्र टिप्प्णी व लोकप्रियता नहीँ, वरन विचारों का संकलन है तो लेखन सहज व स्वाभाविक रहेगा।

5 - पाठकों का आवागमन
संजय जी द्वारा उठाया गया यह प्रश्न वास्तव में ठीक है। कुछ स्तर तक तो एनालिटिकस (Google Analytics) व अन्य औजार बता सकते हैं, पर पाठक की पहिचान नहीँ। यदि पाठक मात्र यह बताना भी चाहें कि उन्होंने लेख/कविता पर दृष्टिपात कर लिया है, अथवा गंभीरता पूर्वक पढ़ भी लिया है तो टिप्प्णी देना एक सरल उपाय है। पर टिप्प्णी को मात्र इसीलिये प्रयोग किया जाय? मैं स्वयं अनिश्चित हूँ। हाँ, यदि चिट्ठाकार / टिप्प्णीकार यह मान ले कि कोई फर्क नहीँ पड़ता चाहे कोई पढ़े अथवा नहीँ, तो इस समस्या से भी निजात। वैसे रवि जी ने एक सरल उपाय भी बताया था किलकाती टिप्पणियाँ शीर्षक से।

6 - हिन्दी व अंग्रेज़ी चिट्ठों की तुलना
मेरे विचार से यह एक गंभीर मसला है। क्यों हम इतनी आशा करते हैं मात्र टिप्पणियों की? क्यों जुगत लगाते हैं? क्यों नहीँ स्वाभाविक रूप से लेखन, पाठन व टिप्पणियाँ होने देते? क्यों इनको आपसी सम्बन्धों का मापक मान लेते हैं? हिन्दी चिठ्ठाकारी में शायद यह परम्परा व हमारी सामाजिक संस्कृति से आ गया है।

यदि अंग्रेजी चिट्ठाजगत को देखें तो अनेकानेक चिठ्ठे व अनेकानेक लेख महीनों टिप्प्णीशून्य रहते हैं। यह बात नहीँ कि वे सभी स्तरहीन हैं। मैंने अनेकों बार तकनीकी व अन्य विषयों सम्बन्धी ऐसे चिट्ठे देखे हैं जो कि सारगर्भित होते हुए भी टिप्प्णीशून्य थे। ऐसा मानना ग़लत होगा कि वे कभी पढ़े ही नहीं गये, पर अधिकांशत: औपचारिकता के लिये टिप्पणी की गयी हो ऐसा अपेक्षाकृत कम पाया है मैंने - विशेषकर नियमित चिट्ठाकारों में। हिन्दी चिट्ठाजगत में है यह धारणा।

कदाचित् अंग्रेज़ी चिट्ठाजगत के विस्तार, वैविध्य के कारण ऐसा हो। हाँ, पर उनमें भी सन्दर्भ होने पर पारस्परिक कड़ियाँ अधिकांशत: पायी जाती हैं। कई चिट्ठों में बहुत-बहुत समयांतराल बाद भी, पर नियमित रूप से टिप्प्णियाँ बरसती हैं - यह भी हिन्दी चिट्ठाजगत में होता तो है पर कम ही, मेरे अनुमानित विश्लेषण से रवि जी के चिट्ठे पर ऐसा पाया जाना स्वाभाविक है। क्या कारण हैं इसके? यदि विषयों से बंधा हुआ, सारगर्भित लेखन होगा तो टिप्पणी हो न हो, पाठक पहुँचेंगे अवश्य ही - आज नहीं तो भविष्य में। ऐसे आश्वस्त रह कर मात्र गुणवत्ता की ओर ध्यान दिया जाय। मात्र औपचारिक टिप्प्णियों को कुछ कम करें तो शायद विविधता और गुणवत्ता में और भी सुधार हो।

7 - समीर जी की टिप्प्णियाँ
समीर जी की टिप्प्णियाँ अपवाद हैं। ये वास्तव में विशेष स्थान रखती हैं वह तकनीकी कारणों से भी। चूंकि वे टिप्प्णी के मामले में दानवीर कर्ण, राजा हर्षवर्धन से भी आगे है, बिन माँगे ही सब कुछ दे देते है इसलिये अब तो उनसे टिप्प्णी की अपेक्षा अवश्य ही करनी चाहिये और अब तो समीर जी यह अघोषित दायित्व हो ही गया है ;) यदि समीर जी की टिप्प्णी न मिले तो हम तो समझते हैं कि कोई तकनीकी लोचा है, शायद यह पोस्ट कनाडा में दिख नहीँ रही, अन्यथा उनकी टिप्पणी आती अवश्य, सो पुन: चिट्ठे की तकनीकी जाँच आवश्यक हो जाती है!

8 - टिप्प्णीशून्य लेख / चिट्ठा
मसिजीवी का कभी कभी अनहिट, निर्लिंक व टिप्‍पणीशून्‍य भी लिखें- अपने लिए
मुझे अच्छा लगा। बहुत आनंद रहता है अपने लिये लिखने में, और जो टिप्प्णीशून्य भी हो। अजी, टिप्प्णीशून्य लेख का आनन्द तो बहुत उच्च कोटि का है। मैंने भी लिखा है कुछ टिप्पणीशून्य - बिलकुल ऐसा लगता है कि आपने एक विशाल धनराशि (लेखक के दृष्टिकोण से) को बिना ताले, खुले में छुपा रखा है और कोई उसकी तरफ देख भी नहीँ रहा! अब फ़ुरसतिया, जीतू, रवि जी, व समीर जी तो ऐसा आनन्द पाने से रहे। तो आप इसी से प्रसन्न रहिये कि जो नामचीन चिट्ठाकार नहीं पा सके (और अब पा भी नहीँ सकते, जब तक वे छ्द्म नाम से नहीँ लिखते) वे आप अनायास ही पा जाते हैं, और पाते रह्ते हैं जब तक भूले-भटके ग़लती से कोई टिप्प्णी नहीं कर देता। वाह! क्या बात है!

एक बात और भी, एक चलचित्र (दिल चाहता है) का यह संवाद लेख के टिप्प्णीशून्य रहने पर ही पर लेख की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है -

परफेक्शन में इंप्रूवमेंट का स्कोप नहीँ रहता

8 - अन्य चिट्ठाकारों के लेख

कुछ अन्य पठनीय लेख जो पूर्व में अन्य चिट्ठाकारों द्वारा टिप्पणी, लोकप्रियता, पारस्परिक टिप्पणी आदि विषयों पर लिखे गये हैं, इनमें व्यंग्यात्मक व गंभीर दोनों ही हो सकते हैं (यदि कुछ रह गये हों तो संज्ञान में आने पर जोड़ दिये जायेंगे)

टिप्पणी-निपटान की जल्दी
चिठ्ठे का टी आर पी
रेडीमेड टिप्पणियाँ
हिंदी में चिट्ठाकारी के कारण पर विचार
पीठ खुजाना: पारस्परिक टिप्पणी
टिप्पणियों के जुगाड़

इसके अतिरिक्त भी बहुत लोगों ने - समीर लाल जी, जीतू जी, रवि जी, फुरसतिया जी, आलोक जी, ज्ञान जी आदि ने भी इन विषयों पर तथा नुस्खे आदि पर एकाधिक बार लिखा है - जिन खोज तिन पाईयाँ, हमने तो पढ़ा था, पर खोज नहीँ पाय।

अब और लिखा नहीँ जाता, दिमाग का क्या है, भागता ही रहता है।


अस्वीकरण
पुन: यह स्माइली ;) चुनौती के लिये - यह मात्र लेखन के लिये है कोई दंगल की चुनौती नहीँ

28 टिप्‍पणियां:

उन्मुक्त ने कहा…

जब टिप्पणी पर शोध हुआ है तो क्या टिप्पणी दें।

Gyandutt Pandey ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अनिल रघुराज ने कहा…

प्रेक्षण और विश्लेषण दोनों काफी उपयोगी हैं। मन को खुश करने के लिए यह लाइन भी आपने नई दे दी कि परफेक्शन में इंप्रूवमेंट का स्कोप नहीँ रहता। अभी तक मैंने मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की वो आदत पाल रखी थी कि सूनी बावड़ी में सूरज की किरणें भी आ जाती थीं तो उसे लगता था कि सूरज ने उसे प्रणाम किया है।

notepad ने कहा…

अच्छी खोजबीन कर डाली है । अब टिप्पणविमर्श के लिए जगहजगह भटकना नही पडेगा । पर यह भ्रम कैसे पाल लिया कि कुछ परफ़ेक्ट जैसा है ब्लाग जगत में । हम तो इसे सर्वाधिक लोकतान्त्रिक विधा मानकर चल रहे थे कि सब बराबर, सब समान। पर आपने यहां भी कुछ गढ गिना दिए ।चलिए, आपकी समझ । कोई क्या कहे :)

संजय तिवारी ने कहा…

यह लेख ब्लागिंग के इतिहास का हिस्सा होगा. बहुत अच्छा विश्लेषण.

Divine India ने कहा…

वाहSSS एक और गहरा गंभीर चिंतन…।
अब तो एक ही जुगत बची है इसपर
इनसाइकलोपेडिया तैयार करने की आवश्यकता है…
यानी… Ten Comaandments... :)

Gyandutt Pandey ने कहा…

यह किनारे बैठे व्यक्ति का बहुत सामयिक लेख है. व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि हिन्दी ब्लॉगरी में मेरे इंवाल्वमेण्ट और मेरी अपेक्षाओं को काफी हद तक प्रभावित करेगा.
सम्भवत मैं मानसिक रूप से जिस प्रक्रिया में था, उसमें यह पोस्ट समय से आयी.
ब्लॉगिंग में टिप्पणियों का महत्व कुछ ज्यादा ही है और यह एडिक्शन के स्तर पर चला गया है. एल्कोहलिक-एनॉनिमस की तर्ज पर कमेण्टोहलिक-एनानिमस की जरूरत तो नहीं! :)

rachna ने कहा…

Please also wrtite something on why people use " popular/well known blogger names " in head lines to drive traffic to their sites.

Sanjeet Tripathi ने कहा…

वाह!! बढ़िया चिंतन कर डाला है आपने तो!!

सबसे ज्यादा मै आपको धन्यवाद इतने सारे लिंक यहां एक जगह उपलब्ध कराने के लिए देना चाहूंगा।
काफ़ी कुछ दे दिया आपने पढ़ने को!

Shrish ने कहा…

वाह राजीव जी आपने तो टिप्पणियों पर अच्छा खासा शोध कर डाला। साथ में सभी लिंक् भी दे दिए, धन्यवाद।

अब इस चिंतन पर क्या टिप्पणी करें सूझ नहीं रहा?

राजीव ने कहा…

उन्मुक्त जी,
अरे, इसे शोध जैसी भारी संज्ञा का नाम मत दें। बस, विचारों को खरी भाषा में संकलित करने का प्रयास किया है!

Divine India व संजीत जी,
गंभीर चिंतन! गम्भीर तो लेखक / कवि, शोधार्थी आदि होते हैं, यह तो बस जैसा उन्मुक्त जी से कहा - यह मानें कि अपनी सोच-समझ और कुछ कड़ियों का एग्रीगेशन, कभी संदर्भे के ही काम आ जाये।

अनिल जी,
सूनी बावड़ी में सूरज की किरणों का भी दृष्टांत सहेजने लायक है! बस सूरज की मर्यादा रखते हुए हम यह मानेंगे कि उसकी किरणें प्रणाम के लिये नहीँ, वरन् आशीर्वाद के हेतु आ जाती हें। सूरज तो आयेगा ही, हमारे जगत में भी...

संजय जी,
बस टिप्पणी तनाव युक्त न हो लेखन - यही इच्छा है! इतिहास के लिये तो बहुत से विद्वान साथियों के संकलन और चिट्ठे हैं ही!

नोटपैड जी,
लगता है कि हम कुछ सही नहीँ लिख पाये - हमारा अर्थ यह नहीँ था कि हमारा या किसी का ब्लॉग परफ़ेक्ट है - वह वाक्य तो सांत्वना और संतोष पाने का उत्तम माध्यम लिखा है हमने! बस याद रखो और टिप्पणी विहीन पोस्ट पर भी मस्त रहो। ब्लॉग तो उन्मुक्त माध्यम है ही, कौन नकार रहा है इसे! पर परफेक्शन - वह तो कहीँ भी नहीँ। ब्लॉग में भी नहीँ। परफेक्शन होने पर तो गति/परिवर्तन/सुधार शायद समाप्त ही हो जाये। बस यही कहना था। हम तो परफेक्शन को य़ूटोपियन मानते हैं।

ज्ञान जी,
यदि इससे किसी पर भी धनात्मक या सार्थक प्रभाव हो तब तो मैं हर्ष करूँगा, शायद गर्व भी।

श्रीश जी,
यही लिंक वाली उपयोगिता समझें, शोध यदि मानें भी तो बस टिप्पणी तनाव-मुक्त रहने के नोट्स!

Shastri JC Philip ने कहा…

प्रिय राजीव,

यह लेख एक बहुत ही उपयोगी अवलोकन है. इस कारण इस विषय पर हो रही चर्चा कुछ आगे बढी है.

विषय से संबंधित लगभग सारे महत्वपूर्ण लेखों की कडी को एक जगह लाकर आपने सबकी मदद की है जो विषय को विस्तार से समझना चाहते है.

अभी चर्चा समाप्त नहीं हुई है. और आगे बढने की जरूरत है -- शास्त्री जे सी फिलिप


हिन्दीजगत की उन्नति के लिये यह जरूरी है कि हम
हिन्दीभाषी लेखक एक दूसरे के प्रतियोगी बनने के
बदले एक दूसरे को प्रोत्साहित करने वाले पूरक बनें

अनूप शुक्ला ने कहा…

धांसू लेख लिखा है। ऐसे ही लिखते रहा करें कभी-कभी। हमारे कानपुर में रहने से लिखने में परेशानी होती हो बताया जाय हम रोमिंग पर चले जाया करेंगे।:)

राजीव ने कहा…

रचना जी,
लोग ऐसा क्यों करते हैं कि आवागमन की दिशा अपनी साइट की ओर करने हेतु अपने लेख के शीर्षक में अन्य लोकप्रिय चिट्ठाकारों के नाम लिख देत्ते हैं। इस मुद्दे पर आपने लिखने को कहा है। लोग ऐसा करते ही हैं, क्यों करते हैं, आदि - यह तो मैं सही से नही जानता। संभवत: यदि इस प्रश्न का सम्बन्ध इसी लेख से है तो मैं प्रयास कर सकता हूँ।

यदि ध्यानपूर्वक देखें तो इस लेख में दो स्थानों पर उन दो चिट्ठाकारों का उल्लेख किया गया है, जिनका नाम शीर्षक में है - वह भी पूर्ण रूप से संदर्भ के अंतर्गत। उन दोनों स्थान पर उनका ज़िक्र, किसी विशेष बिन्दु के प्रतिपादन के लिये था और दोनों स्थानों पर इन नामों का प्रयोग मेरे विचार से युक्तिसंगत जान पड़ा, अपने विचार के स्पष्टीकरण के साथ - तभी उनका प्रयोग शीर्षक में किया गया है क्योंकि इसका सम्यक विवरण है लेख में। अतिरिक्त इसके, इन नामों का उल्लेख गौड़ रूप में किया गया है - शीर्षक के पूर्वार्ध में नहीं, तो मैं समझता हूँ कि यदि संदर्भ के अनुकूल और सम्यक विवरण है तो यह अनुचित नहीँ है।

इस चिट्ठे के अलवा अभी तक, मात्र एक और चिट्ठे में अनूप जी के प्रचलित नाम का प्रयोग किया है मैंने - फुरसतिया जी का निमंत्रण और साली का विवाह इस लेख के मसौदे में भी उनका विवरण विषय-वस्तु के साथ ही है|

अपनी समझ से मैंने उन नामों का प्रयोग मात्र लेख के मसौदे के साथ किया है, न कि आवागमन बढ़ाने हेतु, फिर भी यदि फीड एग्रीगेटर्स चाहें तो सम्पादित कर उसे हटा सकते हैं। पाठक अथवा मात्र वे चिट्ठाकार भी आपत्ति दर्ज़ करें तो मैं स्वयं ही, सहर्ष हटा लूंगा - शीर्षक क्या, पूरी पोस्ट, चिट्ठा - कुछ भी, जैसा भी उचित हो, या अन्य तरीका जिससे पाठकों को भ्रम न हो। अपने लिये इन्हें कहीँ और संकलित कर ही लूंगा।

शास्त्री फिलिप जी,
आपको यह उपयोगी लगा। धन्यवाद! कड़ियों का संकलन तो मात्र लेख की विषय-वस्तु के संदर्भ में किया था। जैसा मसिजीवी ने लिखा था, ऐसे और भी कुछ चिट्ठे/लेख हैं - अनुभवी चिट्ठाकारों के, और सारगर्भित भी हैं, पर मुझे जो मिल पाये उनको तो लिख दिया, और यदि हितकर हुआ तो जब याद रहा, जोड़ दिये जावेंगे।

अनूप जी,
कभी-कभी ही तो लिख देते हैं, अक्सर लिखने का माद्दा कहाँ! अच्छा किया जो बता दिया, अब जब कहीं आपको यायावरी के लिये भेजना होगा तो कह देंगे कि "जाओ अभी, कुछ लिखने का मन है।" कम से कम कुछ और नवीन (मार्केट के नहीँ) यात्रा-वृत्तांत तो मिलेंगे पढ़ने को।

rachna ने कहा…

"अपनी समझ से मैंने उन नामों का प्रयोग मात्र लेख के मसौदे के साथ किया है, न कि आवागमन बढ़ाने हेतु" आप एक बार कोई भी पोस्ट बिना इन दोनों नामो कै डाले और फिर मिलान कर कै देखे कितने लोग आप की पोस्ट को पढते हें .
"फीड एग्रीगेटर्स चाहें तो सम्पादित कर उसे हटा सकते हैं।" फीड एग्रीगेटर्स इस मे कुछ नहीं करेगे अन्यथा विवाद होगा की लिखने की आजादी है .
"वे चिट्ठाकार भी आपत्ति दर्ज़ करें " आपत्ति दर्ज़ कराने का अधिकार आप चिट्ठाकार को देना चाहते है परन्तु क्या आप ने उनसे पूर्व अनुमती ली थी ?
किसी भी शोध को करना अति उत्तम है पर किसी के नाम की वजह से हम अपनी पोस्ट को आगे लाए जाये ये मुझे उचित नहीं लगा सो मे ने अपने विचार रखे .
समीर लाल , शास्त्री फिलिप जी , नारद , फुरसतिया , रवि रतलामी का नाम किसी भी पोस्ट के शीर्षक मे हो उसे कम से कम ९९% ब्लॉगर अवश्य पढते है एसा मेरा अनुभव रहा है जबकी मै केवल ३ माह से हिन्दी ब्लोग्गिंग मै हूँ .

masijeevi ने कहा…

राजीव आपने यह जरूरी किसम का लेख लिखा हे सो भी पूर्ण लिंकन के साथ, शुक्रिया।

आप किसी हम इसे सेव किए ले रहे हैं संदभ्र के लिए, इस लेख को बार बार संदभ्रित किया जाया करेगा ऐसा हमें लगता है।

टिपपणीशून्‍य के संतोष के लिए तो लिखा आपने किंतु शायद किसी कारण से टिप्‍पणी प्‍लावन की हानियों से कन्‍नी काट गए, नहीं ?

खुद को 'उस स्‍तर का' ब्‍लॉगर मानने की गलती नहीं ही करता, पर इतना मुझे कभी कभी लगता है कि टिप्‍पणी सुपन्‍नता कभी कभी अहम को हवा देती है जो लेखन के लिहाज से बहुत अच्‍छी चीज नहीं।

masijeevi ने कहा…

राजीव आपने यह जरूरी किसम का लेख लिखा हे सो भी पूर्ण लिंकन के साथ, शुक्रिया।

आप किसी हम इसे सेव किए ले रहे हैं संदभ्र के लिए, इस लेख को बार बार संदभ्रित किया जाया करेगा ऐसा हमें लगता है।

टिपपणीशून्‍य के संतोष के लिए तो लिखा आपने किंतु शायद किसी कारण से टिप्‍पणी प्‍लावन की हानियों से कन्‍नी काट गए, नहीं ?

खुद को 'उस स्‍तर का' ब्‍लॉगर मानने की गलती नहीं ही करता, पर इतना मुझे कभी कभी लगता है कि टिप्‍पणी सुपन्‍नता कभी कभी अहम को हवा देती है जो लेखन के लिहाज से बहुत अच्‍छी चीज नहीं।

Manish ने कहा…

देर से आपके इस लेख पर नज़र गई।
कब और क्या टिप्पणी दें पर आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। टिप्पणियों के विषय में बहुत लोगों ने पहले भी लिखा है पर आपने जिस तरह इसके हर एक पहलू पर सिलसिलेवार चर्चा की है वो बेहद पसंद आई।

राजीव ने कहा…

रचना जी,
एक बार पुन: अपना पक्ष रखता हूँ।

आप एक बार कोई भी पोस्ट बिना इन दोनों नामो कै डाले और फिर मिलान कर कै देखे कितने लोग आप की पोस्ट को पढते हें
पाठकों को भ्रमित कर पढ़ाने का उद्देश्य ही नहीँ था। फिर भी यदि संभव हुआ तो भविष्य में कदाचित ऐसा भी किया जायेगा।

फीड एग्रीगेटर्स इस मे कुछ नहीं करेगे अन्यथा विवाद होगा की लिखने की आजादी है
ऐसा करने पर मेरी ओर से कोई आपत्ति नही, वरन एग्रीगेटरों से निवेदन भी है, पोस्ट/शीर्षक हटा देने / संशोधित करने तक का। वैसे उन्हें भी स्वतंत्रता है, मेरा अधिकार तो नहीँ उन पर।

आपत्ति दर्ज़ कराने का अधिकार आप चिट्ठाकार को देना चाहते है परन्तु क्या आप ने उनसे पूर्व अनुमती ली थी ?
मेरे संज्ञान में नहीं था कि शीर्षक में नाम के लिये पूर्वानुमति का कोई प्रथा या विधान है। यदि है तो कृपया अवगत करा दें और मैं सहर्ष किसी भी संशोधन के लिये तत्पर हूँ। इसके अतिरिक्त मैं तो अन्य चिट्ठाकारों को भी आपत्ति जताने के लिये कहता हूँ। यदि 2-3 अन्य नियमित चिट्ठाकार / पाठक भीं कह दें कि यह मात्र भम के लिये है और मसौदे से सम्बन्धित नहीँ, तो मैं सहर्ष उस पर कार्य करूँगा।

किसी के नाम की वजह से हम अपनी पोस्ट को आगे लाए जाये ये मुझे उचित नहीं लगा सो मे ने अपने विचार रखे
मेरा उद्देश्य तो ऐसा नहीं था। आपको पूर्ण स्वतंत्रता है, अपने विचार रखने की, ऐसा न होता तो टिप्पणी Moderated होती। मैं प्रतिक्रिया के लिये आपका आभारी हूँ।

मसिजीवी जी,
शायद किसी कारण से टिप्‍पणी प्‍लावन की हानियों से कन्‍नी काट गए, नहीं ?
टिप्‍पणी सुपन्‍नता कभी कभी अहम को हवा देती है जो लेखन के लिहाज से बहुत अच्‍छी चीज नहीं
नहीँ भाई! कोई कारण नहीँ था। यह बिन्दु तो ध्यान में ही नहीँ आया। सही कहा है आपने, बस एक बात कह सकता हूँ, कि हमें कहाँ टिप्‍पणी प्‍लावन का तजुरबा! सो हम इसके नुकसान/फ़ायदे जान भी कैसे सकते है! वैसे एक बात मैंने अवश्य लिखी है - इशारा है मात्र। देखें बिन्दु सं. 2 दरअसल यह अपेक्षा ही मूल है, निराशा का भी (यदि अपेक्षा पूरी न हुयी) और प्रोत्साहन का भी / लोभ का भी (यदि अपेक्षा पूरी हो गयी तब भी) शायद इसमें कुछ-कुछ समाहित है, जो आप इंगित कर रहे हैं।

मनीष जी,
धन्यवाद!

Udan Tashtari ने कहा…

इतना गहन अध्ययन और मनन करके इस तथाकथित विचारणीय मुद्दे पर राजीव जी ने जिस ओजपूर्ण तरीके से अपने विचार और चुनौती की ललकार लिखी है, वो काबिले तारीफ है. मैं साधुवाद देता हूँ.

हालाँकि एकाएक टिप्पणी विषय पर आई आँधी का तात्पर्य ही मेरी समझ के बाहर है. अव्वल तो यह विषय इतना गुढ़ है ही नहीं कि इस पर इतनी ज्यादा चर्चा की जाये मगर फिर भी अगर विचार उठे हैं तो उनका समाधान और निष्कर्ष भी होना ही चाहिये. टिप्पणी की महत्ता और उपयोगिता तो तभी समझ आयेगी, जब हम टिप्पणी का सही अर्थ जान लें कि आखिर यह है क्या बला!!

रहा शीर्षक में या अलेख में नाम का इस्तेमाल करना. तो यह तो परंपरा रही है. सभी करते हैं. हमने भी किया है कि फुरसतिया से मिल कर गलती हो गई, पंकज बैंगाणी का नाम इस्तेमाल किया है और होली पर तो लगभग सभी चिट्ठाकारों का. जहाँ तक आप लिंक दे रहे हैं, नाम दे रहे हैं और वह भी आलेख की जरुरत के अनुरुप, तब इसमें तो शायद ही कोई आपत्ति हो. वैसे भी इस हेतु अनुमति लेने की परंपरा अभी तक तो नजर में नहीं आई मुझे.

राजीव भाई से मेरे व्यक्तिगत संबंधो को यदि दर किनार भी कर दिया जाये तो भी पुर्वानुमति की बात तो किसी के लिये भी जायज नहीं है. अगर न पसंद आये तो बाद में उसे हटवाना तक तो जरुर देखा गया है मगर पूर्वानुमति वाली बात कभी नहीं दिखी.

रचना जी, आप क्यूँ परेशान हो रहीं है इस बात को लेकर. यह आलेख तो एक बेहतर उद्देश्य को लेकर लिखा गया है. इस पर लोगों में विमर्श की आवश्यक्ता महसूस की जा रही थी और राजीव भाई ने तो सिर्फ उसे आगे बढ़ाया है.

शास्त्री जी की सोच भी सही है कि अब विचार शुरु हुआ है तो इसे समाधान और निष्कर्ष तक ले जाया जाना चाहिये. तब तो कितने आलेखों का संदर्भ और कितने नामों का लिंकन और हो जायेगा, यह अभी से कहा जाना संभव ही नहीं है, मगर सबसे पूर्वानुमति लेने का विचार फिर भी जायज न होगा.

यह कम से कम हिन्दी चिट्ठाकारी जबसे मैने शुरु की है तब से अनवरत चलता ही आ रहा है और मुझे लगता है कि यह एक स्वस्थ परंपरा है, चलती रहना चाहिये. आपसी भाईचारा और संबंध ही प्रगाड़ होंगे.

राजीव भाई को ट्रेफिक मिले इसका तो कोई फायदा उन्हें होने से रहा-एड सेन्स तक तो लगाये नहीं हैं. :) अरे, हम तो खुद ही ट्रेफिक सिंग्नल हरा किये बैठे है कि लोग आयें. हमारे नाम से कोई क्या और कितना ट्रेफिक पा लेगा. :)

मगर फिर भी अच्छा लगा रचना जी कि आपने इतना सम्मान दिया कि हमारे नाम से ट्रेफिक मिलता है. आपका बहुत साधुवाद. यही तो आपका स्नेह है, बस बनाये रखें.

आज ’टिप्पणी क्या है और क्यूँ करे”, विषय पर अपना आलेख ले ही आता हूँ. इन्तजार करें.

Rachna Singh ने कहा…

@rajiv
tradtions are never built in a day . hindi blogging is still at infancy stage and as we teach our children indian culture , indian heritage , indian customs we should try to make some "unwrittenn rules and regulations " for our self . you people may be using names in headlines for driving traffice to your site on a article that you feel others should read . but new bloggers use this technique to malign or defame others . 2 times it has happened with me once by masjeeve and other time by kamlesh maddan.
@sameer
ab anuj kae liyae koi kuch bhi bol jayae mae pareshan naa houn !!!

राजीव ने कहा…

Rachna Ji,
Apologies for writing in English, but I had to do it as a part of protocol.

Whatever you have said regarding unwritten constitution might well be the topic of future debate. However, the allegation which I would persist to defend is regarding that of misleading the visitors. It was neither intended nor happened and title was much in line with the content. Also, there was no intention to force the visitors to read any particular article. I presume the visitors are intelligent enough to make a choice. Blogger and readers have equal freedom in publishing and reading respectively - rather, readers have more freedom, if I may say so.

Also, with due regards, may I request you and others to continue further debate, if required, elsewhere. If Paricharcha permits, the same can be used. Sole purpose being benefit of the tentative article reader and avoiding the blog entry getting overloaded with repeated comments. I shall be pleased to offer my clarifications and views right there along with a link from here. I believe that forums/newsgroups are traditionally the right place for discussions. You can even have polls there!

Finally, I would also apologize to community for using English.

PD ने कहा…

Wah...

tippani ke upar itni tippani padhakar maza aa gaya..
;)

सागर चन्द नाहर ने कहा…

एक बार फिर लेट लतीफ साबित हुआ मैं, पढ़ तो कब का लिया पर टिप्प्णी करने की सोच ही रहा था कि नेट डिस्कनेक्ट हो गया और बात रह गई।
टिप्प्णी का सबसे बड़ा महत्व तो आपके इस लेख से, स्पष्ट दिख रहा है कि छोटी छोटी टिप्प्णीयाँ देने वाले चिठ्ठाकार भी बड़ी टिप्प्णीयाँ लिखने को मजबूर हुए।
और राजीव जी जैसे कम लिखने वाले चिठ्थाकार एक बार फिर सक्रिय हुए।
बढ़िया लेख और लिंकित करने के लिये धन्यवाद।

ravi ने कहा…

बहुत बढियाँ !!!!
आप ने तो हमे टिपण्णी करना सीखा दिया गुरू जी ।
अति सुंदर !!

Raji Chandrasekhar ने कहा…

हेलॊ जी
मैँ केरल से हूँ। मलयालम में ब्लोग कर रहा हूँ।
मैंने ब्लॊगिंग ब्लॊगस्पॊट में शुरू किया था। अब मेरा जॊ ब्लॊग( रजी चन्द्रशॆखर ) वॆर्ड्प्रस में है, उसी में हिन्दी प्रविष्टियाँ भी शामिल कर रहा हूँ । कृपया दॆखें और अड्वैस भी दें।

काकेश ने कहा…

यह लेख तो पढ़ा तो था पर पता नहीं टिपियया क्यों नहीं..चलिये आज इतनी अच्छी टिप्पणीयों सहित फिर पढ़ लिया.अच्छा लगा.

हर्षवर्धन ने कहा…

बाप रे बाप, टिप्पणी पर इतनी बड़ी पोस्ट। मैं देख नहीं पाया था देखते ही टिप्पणी किए बिना लौट नहीं सका। ए राजीव भाई दे दे ना। देने से भला ही होगा।